भारतीय लोकतन्त्र में महिला राजनीतिक सहभागिताः एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण
Dr. Nistar Kujur1 and Dr. B.L. Sonekar2
1Asstt. Professor, School of Studies in Sociology, Pt. Ravishankar Shukla University, Raipur (C.G.) - 492010
2Asstt. Professor, School of Studies in Economis, Pt. Ravishankar Shukla University, Raipur (C.G.)-492010
मानव समाज के प्रादुर्भाव से ही समाज में स्त्री व पुरूष अस्तित्व में रहा है तथा मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मानव की आज जो भी उपलब्धि है वह स्त्री व पुरूष के संयुक्त प्रयत्नों का परिणाम है। आज पुरूष यह नहीं कह सकता की समाज की संस्कृति, परम्परायें, भाषा, बौद्धिक विकास इत्यादि केवल पुरूष के प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज में विद्यमान है। अर्थात जीवन के प्रत्येक पक्ष में महिलायें शामिल रही है। किन्तु नीति निर्धारण संस्थाओं में उनकी 10 प्रतिशत से अधिक सहभागिता नहीं है। संगठित क्षेत्र में भी उनकी संख्या 6 प्रतिशत से कम है। हमारे देश में ज्यादातर महिलायें असंगठित क्षेत्र में काम करती है, जैसे - कृषि, मजदूरी, घरेलू नौकर तथा निर्माण मजदूर के तौर पर। इन क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को पुरूषों से काफी कम मजदूरी मिलती है, उदाहरण के लिए कृषि मजदूरों में महिलाओं को पुरूषों की मजदूरी का 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक मिलता है, जबकि वे पुरूषों से कहीं अधिक कठोर श्रम के काम करती हंै।¬1
महिला के संबंध में यह भी सत्य है कि अपवाद कुछ जनजातीय समूह को छोड़कर महिला सदियों से पितृसत्तात्मकता से प्रभावित रही है। पितृसत्तात्मक समाज में राजनीति को पुरूषों का एकाधिकार क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा और महिला वर्ग के लिये यह एक वर्जित क्षेत्र बन गया। भारत में ही नहीं वरन् विश्व के समस्त राजनीतिक समाज के गौरवपूर्ण इतिहास का यह एक काला अध्याय रहा है कि समाज की आधी आबादी को सार्वजनिक जीवन से वंचित रखा गया। दुर्बल लिंग के रूप में महिला की स्वीकारोक्ति के कारण महिला वर्ग को कभी राजनीति का महत्वपूर्ण अंक स्वीकार नहीं किया गया तथा उन्हें दोयम नागरिक की संज्ञा दी गई।2 काल-समय बीतने के पश्चात् विश्व में लोकतन्त्र की स्थापना के साथ परिस्थिति से निकलकर सार्वजनिक जीवन में भागीदारी करेगी।
महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों का एक लम्बा संघर्षमय इतिहास रहा है। लम्बे समय तक विश्व के महिला राजनीतिक अधिकार से वंचित रही है। 19वीं शताब्दी के पूर्व केवल न्यूजीलैण्ड के महिलाओं को मताधिकार प्राप्त था तथा 19वीं सदी के आरम्भ में फिनलैण्ड व जर्मनी के महिलाओं को यह अधिकार प्रदान किया गया तथा फ्रांस, इटली, वेल्जियम, पुर्तगाल, स्पेन और स्विटजरलैण्ड की महिलाओं को मताधिकार द्वितीय विश्वयुद्ध ;1939द्ध के उपरान्त प्राप्त हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लोकतांत्रिक मताधिकार के सिद्धान्त को लगभग सभी यूरोपीय देशों द्वारा अपना लिया गया था। 1922 के मध्य में बर्मा की महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग की तथा विधि प्रक्रिया को सीधे प्रभावित करने वाली प्रथम एशियाई महिलायें बनी। जबकि भारत की महिलाओं को मताधिकार 1935 में प्राप्त हुआ।3 इसके पूर्व भारतीय महिलाओं में कुछ राजनीतिक चेतना अवश्य आ गई थी, जिसके कारण 1919 ‘‘साउथ बोरा कमीशन’’ से श्रीमती एनी बेसेन्ट के नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधि मंडल ने आयोग से मिलकर महिला मताधिका के पक्ष मेंअपनी बात रखी।4
भारत में मद्रास प्रथम राज्य (वर्तमान में तमिलनाडु राज्य) था, जिसने 1921 में अपने प्रदेश की महिलाओं को मताधिकार प्रदान किया। उसी वर्ष बम्बई प्रांत में, तत्पश्चात् 1922 में संयुक्त प्रांत, 1925 में बंगाल, 1926 में पंजाब, 1927 में मध्य प्रांत तथा 1924 में बिहार में यह अधिकार प्रदान किया गया किन्तु यह अधिकार केवल प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं में मत देने तक ही सीमित था।
1926 में भारतीय महिलाओं को व्यवस्थापिका में बैठने का अधिकार प्रदान किया गया।5 तत्पश्चात् 1935 में प्रांतीय व्यवस्थापिका में महिलाओं के लिए 4 सीटें आरक्षित की गई तथा प्रारम्भ में इस अधिनियम में महिला मताधिकार का अनुपातिक निर्धारित किया गया जिसमें 20 पुरूषों के अनुपात में एक महिला को मत देने का अधिकार था। सन् 1937 के प्रांतीय चुनाव में 41 महिलायें सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से और 8 सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से जीती।6 सन् 1946 में जब नेहरू ने अंतरिम सरकार का गठन किया तब राजकुमारी अमृतकौर प्रथम केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनी।7 इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में महिला को स्वतंत्रता के पश्चात् ही राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो सकी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी भारतीय लोकतन्त्र में देखें तो प्रत्येक स्तर पर चाहे वह संघीय स्तर पर चाहे वह संसद हो या राज्य स्तर पर विधानसभ महिला सहभागिता का स्तर पुरूषों की तुलना में नगण्य सा दिखलायी पड़ती है। 15 आम चुनावों के पश्चात् भी भारतीय लोकतन्त्र में महिला वह स्थान प्राप्त नहीं कर सकी है, जो उसे मिलना चाहिए। राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किये जाने वाले प्रत्याशियों में आज भी पुरूषों का ही वर्चस्व होता है। निम्न तालिका इस तथ्य को और भी स्पष्ट करता है:-
म्हिलाओं का लोकसभा में प्रतिनिधित्व संबंधी उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि प्रथम लोकसभा चुनाव में कुल 489 सीट पर चुनाव हुए, जिसमें 51 महिला प्रत्याशी चुनाव लड़ी, जिसमें केवल 22 महिला ने जीत दर्ज की जो कुल निर्वाचित सदस्यों का केवल 4.4 प्रतिशत था। द्वितीय लोकसभा चुनाव 1957 में 45 प्रत्याशी में 27 प्रत्याशी जीती जो प्रथम लोकसभा चुनाव से 5 सदस्यों की वृद्धि हुई। इसी तरह तृतीय लोकसभा चुनाव 1962 में 70 प्रत्याशी में 34 प्रत्याशी जीत दर्ज की इस प्रकार इस चुनाव में 7 अंक की वृद्धि हुई। इसके बाद सातवी लोकसभा चुनाव तक गिरावट आई। आठवीं लोकसभा चुनाव 1984 में 44 उम्मीदवारों ने सफलता प्राप्त की यह कुल चयनीत प्रत्याशी का 8.1 प्रतिशत था। नवीं लोकसभा में 198 प्रत्याशी चुनाव लड़ी, जिसमें 27 प्रत्याशी ने चुनाव जीता। दसवीं लोकसभा चुनाव 1991 में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हुई इस चुनाव में 325 प्रत्याशी चुनाव लड़े, जिसमें 39 प्रत्याशी जीत दर्ज की। ग्याहरवीं लोकसभा चुनाव में भी 599 प्रत्याशी चुनाव लकिन्तु चुनाव जीतने वालों की संख्या 39 ही रह पाई। बारहवीं लोकसभा चुनाव में 252 प्रत्याशी चुनाव लड़े, जिसमें 43 प्रत्याशी जीते, जो जीत दर्ज कुल प्रत्याशी का 8.0 प्रतिशत हिस्सा है। लगभग यही आंकड़ा तेरहवीं चुनाव में भी रहा है।
14वीं लोकसभा चुनाव में कुल 355 महिला उम्मीदवार थीं, जिसमें 45 महिला उम्मीदवार चुनाव जीत सकीं। मनमोहन सिंह मंत्री मण्डल में 7 महिलाओं को मंत्री पद हासिल हुआ। श्रीमती मीरा कुमार केबीनेट मंत्री, श्रीमती रेणुका चैधरी व सुश्री शेलजा को राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), श्रीमती सूर्यकांत पाटिल राज्य मंत्री, श्रीमती कांति सिंह, सुब्बालक्ष्मी जगदीशन तथा पद्मा लक्ष्मी को राज्य मंत्री बनाया गया।8 29 जनवरी 2006 को मंत्री मण्डल का विस्तार हुआ, जिसमें अंबिका सोनी तथा श्रीमती डी. पुरदरेश्वरी को मंत्री मण्डल में शामिल किया गया। 80 सदस्यीय केन्द्रीय मंत्री मण्डल में महिला मंत्रियों की संख्या 09 हो गई।
15वीं लोकसभा चुनाव 2009 में महिलाओं के चुनाव लड़ने वालों की संख्या में कुछ वृद्धि हुई, इस चुनाव में 556 प्रत्याशी चुनाव मैदान में रही, जिसमें 61 प्रत्याशी ने चुनाव जीता जो कुल निर्वाचित हुए सदस्यों का 11.3 प्रतिशत है। इसमें कु. ममता बैनर्जी, श्रीमती अंबिका सोनी तथा कु. शेलजा को केबिनेट मंत्रियों में शामिल किया गया तथा श्रीमती कृष्णा तीरथ को राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), श्रीमती डी. पुरन्देश्वरी, श्रीमती पनाबाका लक्ष्मी, श्रीमती परनीत कौर एवं कु. अगाथा संगमा को राज्यमंत्री बनाया गया।9
राज्य विधानसभा में भी महिला भागीदारी की देखें तो छत्तीसगढ़ राज्य में महिलाओं की भागीदारी नगण्य सी है। विधानसभा आम चुनाव 2008 में कुल 90 सीट में केवल 09 महिला चुनाव जीता सकीं है जो कुल सीट का मात्र 10 प्रतिशत है।
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान सभी वर्ग को समानता के मूलभूत अधिकार की गारंटी देता है। संविधान स्वतंत्रता, भातृत्व, समानता और न्याय के मजबूत सिद्धांतों पर आधारित है। इसके साथ ही संविधान में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बहुत से प्रावधान भी है, जैसे- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986), राष्ट्रीय कार्य योजना (1992), राष्ट्रीय महिला सहभागिता नीति (2001), महिला आयोग अधिनियम (1990) इत्यादि। इसके बावजूद इनका राजनीति में सहभगीता लगभग नगण्य ही कहा जा सकता है।
उपरोक्त तथ्यों के आधार पर निष्कर्षरूयह कहा जा सकता कि राजनीति में महिलाओं की सहभगीता प्रथम लोकसभा से पद्रहवींु लोकसभा चुनाव तक देखें तो औसतन केवल 6.3 प्रतिशत है। जो बहुत कम भगीदारी को दर्शाती है। महिला भागीदारी को बडाने के लिए अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। निम्न सुझाव महिलाओं राजनीतिक सहभागीता बडाने में कारगर सिद्व हो सकते हैै:-
1. ऐसा कहा जाता है कि भारतीय समाज गावों में बसती हैं । यह सही है, क्योंकि यहां के अधिकांश जनसंख्या गांव में निवास करती है और यही बात राजनीति में महिला सहभगीता में भी लागू होती है । गांव की इन महिलाओं में आज हजारों महिलाएं तो ऐसे है जो मतदान तक के लिए अपने पति पर निर्भर रहती है। ऐसी स्थिति में इन्हें राजनीतिक अधिकार से इन्हें क्या सरोकार। जब तक इन महिलाओं कों राजनीति के प्रति जागरूक नहीं किया जाता तब तक राजनीति में सम्पूर्ण भागीदारी को प्राप्त करना संभव नहीं होगा।
2 बहुसंख्य इन महिलाओं की मूलभूत समस्या शिक्षा है जों उनके जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है, जैसे स्वास्थ्य, गरीबी,रहन सहन, परंपरावादी, जादू टोना,अंधविश्वास जीवन के सीमित दैरा इत्यादि। इन सभी कुधारणाओं से निकालना होगा इसके लिए इन महिलाओं कों शिक्षा से जोडना होगा,। जब महिलाओं यह समूह आधुनिक शिक्षा से भलीभांति परीचित हो जायेगी तब यह समूह न केवल अपनी जीवन में सुधार लायेगी बल्कि जीवन के प्रत्येक पक्ष में सशक्त हो कर देश के सर्वांगीण विकास में एक निर्णायक भूमिका निभायेबगी और इस प्रकार महिलाओं की भगीदारी बडेगी।
3 भारतीय राजनीति में दलीय आधार पर राजनीतिक प्रक्रिया संचालित होती है तथा यहां तक पुरूषों बर्चस्व रहा है। यही कारण है कि यदि अब तक के संपन्न सभी चुनावों में देखें तो राजनीतिक पार्टी द्वारा महिलाओं को चुनाव लडनें का अवसर ही नहीं दिया है। गिनती के महिलाओं को पार्टी से टीकट मिला है। अब तक 15 लोकसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके है, जिसमे महिलाओं को प्रत्यासी के रूप में देंखे तों सबसे अधिक अवसर इन्हें 11वीं लोकसभा चुनाव में मिला हैं ।
तलिका क्रमांक - 1.1रू म्हिलाओं का लोकसभा में प्रतिनिधित्व
लोकसभा चुनाव वर्ष कुल सीट कुल प्रत्याशी पुरूष म्हिला कुल निर्वा. सदस्य में महिला प्रतिशत
प्रत्याशी निर्वाचित प्रत्याशी निर्वाचित
1. 1952 489 1874 1823 467 51 22 4.4
2. 1957 494 1518 1473 467 45 27 5.4
3. 1962 494 1985 1915 460 70 34 6.8
4. 1967 520 2389 2302 489 67 31 5.9
5. 1971 520 2784 2698 498 86 22 4.2
6. 1977 542 2439 2369 523 70 19 3.4
7. 1980 542 4620 4478 514 142 28 5.1
8. 1984 542 5574 5406 498 164 44 8.1
9. 1989 529 6160 5962 502 198 27 5.3
10. 1991 531 8699 8374 492 325 39 7.2
11. 1996 543 13952 13353 504 599 39 7.2
12. 1998 543 4693 4441 500 252 43 8.0
13. 1999 543 4684 4371 496 277 47 8.7
14. 2004 543 5435 5080 498 355 45 8.2
15. 2009 543 - - 482 556 61 11.3
ैवनतबम रू ैजंजपेजपबंस त्मचवतज वद ळमदमतंस म्समबजपवद 1952.2004ए 2009ए म्समबजपवद ब्वउउपेेपवद व िप्दकपं
इस चुलाव में कुल प्रत्यासी 13952 चुनाव मैदान ंमें थे , जिसमें केवल 599 प्रत्यासी महिला उम्मीदवार थे इनमें 7.2 प्रतिशत प्रत्यासी ने चुनाव जीता, जबकि इस चुनाव में 13353 पुरूषों ने चुनाव लडा जिसमें केवल 3.7 प्रत्याशी ने ही चुनाव जीत सका। इस प्रकार यदि महिलाओं को अधिक सीटों पर चुनाव लडने की अवसर दी जाये तो निश्चित ही संसद,राज्यसभा,विधानसभा में इनकी सहभगीता गडेगी।
4. इस दिशा में महिला संगठनों को कार्य करना चाहिए जिससें आम महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता आ सके और महिलाओं को किसी राष्ट्रीय दल पर निर्भर नही बल्कि स्वयं इसका निर्माण करके प्रतिनिधित्व के लिए आगे आनी चाहिए।
5. भारतीय समाज में आज भी कई ऐसे समुदाय है जहां कई जातिगत धारणायें हैं जों महिला को वैश्वीकरण की इस दौर में भी चाहर दीवारी के अन्दर रखने की सोच विद्यमान है जिसके कारण ऐसे परिवार के महिलाए कई मायनों में विछडे हुए हैं। इस मनगणंत विचार कोे बदलना होगा ताकि महिलाएं न केवल राजनीति में बल्कि देश के विकास में उनकी भागीदारी बडें।
उपरोक्त सुझाव में महिला आरक्षण सबसे ठोस एवं वैधानिक कदम है, क्योंकि इससे महिलाओं में सकारात्मक सोच का संचार होगा, साथ ही उनमें राजनीतिक भ्रांतियों, संकाओं, समस्याओं का निराकरण हो जायेगा। क्योंकि राजनीतिक दलो में पुरूषों का प्रारंभ से बर्चस्व रहा है और उनकी मनगणंत व भ्रांतिपूर्ण राजनीतिक शैली को समझना आसान नहीं हैं इसमें समय लगेगी । इनके इसी कुचक्र चाल से ये पंचायत व नगरी निकाय में सीट देने की बात करते किन्तु यह बात संसद व राज्यसभा, विधानसभा में आती है तो इनके तेवर अलग दिखाई देने लगते है। इनके इसी रूख के कारण महिला आरक्षण बिल आज भी लंबीत पडे है।
त्म्थ्म्त्म्छब्म्रू
1. आर्य, साधना एवं निवेदिता मेनन; जिरन लोकनीता (स.): नारीवादी राजनीति संघर्ष एवं मुद्दे, कार्यवंयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, पृ. 32.
2. महावर, सुनील; लोकतन्त्र समीक्षा, खण्ड-41, अंक 1-2, जनवरी-जून 2009,
पृ. 11.
3. ैपदहसमए च्ंउमसंय ॅवउमदष्े च्ंतजपबपचंजपवद पद च्ंदबींलंजप त्ंर रू छंजनतम ंदक म्ििमबजपअमदमेेए त्ंूंज च्नइसपबंजपवदए श्रंपचनतए 2007ए च्ण् 271ण्
4. आर्य, साधना एवं निवेदिता मेनन; निजी लोकनीता, नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे, हिन्दी माध्यम, कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 2001, पृ. 34.
5. महावर, सुनील; लोकतन्त्र समीक्षा, खण्ड-41, अंक 1-2, जनवरी-जून 2009,
पृ. 11.
6. नैयर, सुशीला, कमला मनकेकर (संपा.); भारतीय पुर्नजागरण में अग्रणी महिलाएं, नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली, पृ. 311.
Received on 02.03.2011
Accepted on 15.03.2011
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Research J. Humanities and Social Sciences. 2(1): Jan.-Mar. 2011, 27-29